उत्तराखण्ड :क्या है आइरन भट्टी की कहानी
उत्तराखण्ड :क्या है आइरन भट्टी की कहानी
16, Mar 2018,07:03 AM
ANI, Uttarakhand

कालाढूंगी, नैनीताल ज़िले का छोटा सा कस्बा, जहां 1858 में डेविड एंड कम्पनी ने उत्तर भारत की सबसे पहली लौह भट्टी स्थापित की, यहां लौह भट्टी स्थापित करने का मकसद ये था कि लौह भट्टी के लिए कच्चा माल आस पास की पहाड़ियों औऱ जंगलो से मिल जाता था। लौह भट्टी के बनने से स्थानीय लोगो को रोज़गार भी मिला और अच्छा व्यवसाए भी, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव को देखते हुए साल 1876 में सर हेनरी रैमसे ने पेड़ो के कटान पर रोक लगने के बाद इसे बंद कर दिया गया, इस लौह भट्टी का इतिहास कालाढूंगी कस्बे से भी जुड़ा है, जिन बड़े बड़े काले पत्थरो को लौह अयस्क के लिए भट्टी में प्रयोग किया जाता था उसे कुमाउनी भाषा में काला ढूँग यानी काला पत्थर कहा जाता है जिससे इस कस्बे का नाम कालाढूंगी पड़ गया, इस लौह भट्टी की चार सरंचना अभी भी यहां बनी हुई है जो बदहाल औऱ ख़स्ताहाल पड़ी हुई है, स्थानीय लोगो के मुताबिक़ भट्टी के आस पास के खेतों में जुताई के दौरान लोहे के अवशेष अभी भी मिलते रहते है,जिम कार्बेट ने  किताब  ‘माई इंडिया’ में इस लोहे के कारखाने का जिक्र करते हुए लिखा है कि इस भट्टी से जंगलों का विनाश होने की आशंका से इस कारखाने को बंद कर दिया गया। स्थानीय लोगो के मुताबिक आज लौह भट्टी के अवशेष बदहाल हालत में पड़े हुए हैं जिसकी सुध लेने की जरूरत कभी भी सरकार ने नही समझी, उनके मुताबिक अगर सरकार इस लोह भट्टी को संरक्षित करने के प्रयास करती तो यहाँ पर्यटन को नया आयाम मिलता क्योकि लौह भट्टी को देखने पर्यटक यहाँ आते रहते है,उत्तराखण्ड के इतिहास में ये कोई पहला मामला नही है जब कोई महत्वपूर्ण चीज़ बदहाल हालत में पड़ी हो, जानकारो की माने तो सरकार को बदहाल पड़ी इस लोह भट्टी को संरक्षित करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाना चाहिए जिससे इस इलाके को एक नई पहचान मिल सके और पर्यटन को बढ़ावा, लेकिन राज्य बनने के करीब 17 सालों बाद भी आइरन भट्टी की सुध लेने की जहमत किसी नहीं उठाई। हालांकि बदहाल हो रही आइरन भट्टी को देखने और समझने के लिए सैलानी यहां का रुख करते हैं लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सरकार ने जल्द लौह भट्टी की ओर ध्यान नहीं दिया तो भट्टी धराशाही हो जाएगी और इसका वजूद खत्म हो जाएगा। और आइरन भट्टी के खत्म होते ही सैलानियों से इस जगह का नाता टूट जाएगा। ऐसे में सरकार को चाहिए कि भट्टी की तरफ भी ध्यान दें ताकि इस विरासत को सजोया और संवारा जा सके।

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