बसपा ने भी तोड़ा नाता, बीजेपी के लिए संजीवनी
बसपा ने भी तोड़ा नाता, बीजेपी के लिए संजीवनी
21, Sep 2018,03:09 PM
tv100,

बसपा ने भी तोड़ा नाता, बीजेपी के लिए संजीवनी

बसपा अध्यक्ष मायावती ने कांग्रेस की बजाय अजीत जोगी के साथ गठबंधन कर छत्तीसगढ़ के रण में उतरने का फैसला किया है. मायावती का ये फैसला राहुल गांधी के लिए राजनीतिक रूप से बड़ा झटका माना जा रहा है. ये पहली बार नहीं है कि राहुल सहयोगी दलों को साधने में फेल साबित हुए हैं बल्कि इससे पहले कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, त्रिपुरा जैसे राज्यों में गच्चा खा चुके हैं.
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव पर पड़ना स्वाभाविक है. इसके मद्देनजर कांग्रेस नेता बसपा के साथ गठबंधन के लिए लालायित थे. छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और मध्य प्रदेश के अध्यक्ष कमलनाथ बसपा के साथ गठबंधन करने की इच्छा कई बार सार्वजनिक रूप से जाहिर करते रहे हैं.
एक दशक से भी अधिक समय से राजनीति में सक्रिय राहुल गांधी छत्रपों के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के कई नेताओं को भी अपने साथ जोड़कर नहीं रख पाए. राहुल की इसी चूक का फायदा बीजेपी ने उठाया. बीजेपी कांग्रेस के नाराज नेताओं को अपने पाले में लाकर यूपी और पूर्वोत्तर के कई राज्यों की सत्ता को फतह करने में कामयाब रही.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से पहली बार चूक नहीं हुई है. इससे पहले कर्नाटक में भी जेडीएस के साथ गठबंधन कर पाने में असफल रहे थे. इसी का नतीजा था कि बीजेपी वहां सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि बाद में त्रिशंकु विधानसभा के हालात होने के बाद बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाई. इसी कारण कांग्रेस के पास जेडीएस से ज्यादा सीटें होने के बाद सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी.

त्रिपुरा में कांग्रेस और लेफ्ट के साथ मिलकर चुनाव न लड़ने का खामियाजा उसे भुगतना पड़ा. कांग्रेस का वोटबैंक बीजेपी में शिफ्ट हो गया और उसके खाते में एक भी सीट नहीं आई. हालांकि लेफ्ट को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है.

कांग्रेस को सहयोगी दलों को साधने का नुकसान झारखंड में उठाना पड़ा था. 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का झारखंड मुक्ति मोर्चा से अलग होकर चुनाव लड़ने बीजेपी के लिए फायदेमंद रहा. इतना ही नहीं यूपी के विधानसभा चुनाव के आखिरी वक्ता में सपा से गठबंधन हो सका था. कहा जाता है कि उसमें भी प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही दोनों पार्टियों में सहमति बन पाई.

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