दशहरा उत्सव में हस्तशिल्प कारोबार को झेलनी पङ रही मंदी की मार
13 Nov, 2018

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव आयोजित किया गया था। लेकिन उत्सव में हाथों से तैयार किए गए उत्पादों की बिक्री नाममात्र ही हो पाई है। इस बार दशहर उत्सव में जहां कारोबारियों को प्लॉट महंगे दामों पर मिले हैं, वहीं हस्तशिल्पियों को भी कारोबार में मायूसी ही हाथ लगी है। यहां हम बात कर रहे हैं नगाल (बांस) से टोकरियां, किल्टे, सूप व अन्य उत्पाद तैयार करने वालों की।
पाहनाला के मेघ सिंह सोनी का कहना है कि वह हर साल कुल्लू दशहरा उत्सव में हाथों से तैयार किए गए उत्पादों का स्टाल लगाते हैं। लेकिन उन्हें भी हर बार मंदी की मार झेलनी पड़ती है। उनका कहना है कि “लोगों का इस बार उक्त उत्पादों की खरीददारी के प्रति कम ही रुझान देखने को मिला है। लोग प्लास्टिक से बने किल्टे, टोकरियों को खरीद रहे हैं। ऐसे में इसका असर हस्तशिल्पियों के कारोबार पर पड़ा रहा है। एक किलटे को तैयार करने के लिए जहां हस्तशिल्पी को दो से तीन दिन लगते हैं, वहीं उस उत्पाद के पीछे कारीगर की खासी मेहनत भी होती है। लेकिन अब लोगों ने हाथों से तैयार किए उत्पादों को खरीदना कम कर दिया है और मशीनों से तैयार होने वाले उत्पादों को खरीद रहे हैं। ऐसे में आने वाली पीढ़ी शायद ही हस्तशिल्प कला सीखने में अपनी कोई रुचि दिखाए”।
धीरे-धीरे हस्तशिल्पी समाप्त हो रही। यह कला आज अंतिम दौर में पहुंच चुकी है। आने वाले समय में न तो हस्तशिल्पी जंगलों में जाकर नगाल (बांस) लाएगा और न ही उसके किल्टे, टोकरियां बनाएगा।

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